Notice Period Controversy: कर्मचारी ने पूरा किया नोटिस, फिर भी HR ने क्यों मांगा दोबारा?

Notice Period Controversy

कॉरपोरेट दुनिया में इस्तीफा देना एक सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन कभी-कभी यही प्रक्रिया बड़े विवाद का कारण बन जाती है। हाल ही में एक ऐसा मामला सामने आया जिसने कर्मचारियों और एचआर नीतियों को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।

दिल्ली के एक ग्राफिक डिजाइनर की कहानी काफी चर्चित हो रही है। उसने 2025 में नौकरी से इस्तीफा दिया, पहले नोटिस पीरियड पूरा किया और आख़िर में कंपनी में रहकर काम भी किया। उसके बाद उसने दूसरी बार इस्तीफा दिया लेकिन HR ने कहा कि उसे फिर से नोटिस पीरियड सर्व करना होगा। यह सुनकर कर्मचारी हैरान रह गया। उसने नियमों का पालन किया था, कंपनी ने उसे रिलिविंग लेटर भी जारी किया था, फिर दोबारा नोटिस पीरियड की मांग कैसे की जा सकती है? यही सवाल अब हजारों नौकरीपेशा लोगों के मन में है। इस पूरे मामले को विस्तार से समझना जरूरी है ताकि हर कर्मचारी अपने अधिकारों और जिम्मेदारियों को बेहतर तरीके से जान सके।

नोटिस पीरियड क्या होता है और इसकी कानूनी स्थिति क्या है

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि नोटिस पीरियड कोई सार्वभौमिक सरकारी नियम नहीं है। भारत में निजी क्षेत्र की नौकरियों में नोटिस पीरियड मुख्य रूप से रोजगार अनुबंध या अपॉइंटमेंट लेटर के आधार पर तय होता है। यानी आपने जॉइनिंग के समय जिस दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए थे, वही आपके और कंपनी के बीच कानूनी समझौता है।

अधिकांश कंपनियां 30, 60 या 90 दिन का नोटिस पीरियड तय करती हैं। इसका उद्देश्य यह होता है कि कर्मचारी के जाने से पहले कंपनी को नया व्यक्ति नियुक्त करने और काम का सुचारु हस्तांतरण सुनिश्चित करने का समय मिल सके। कुछ कंपनियां नोटिस पीरियड बायआउट का विकल्प भी देती हैं, जिसमें कर्मचारी नोटिस अवधि की सैलरी देकर तुरंत मुक्त हो सकता है।

कानूनी रूप से यदि कर्मचारी ने अनुबंध में लिखी अवधि के अनुसार नोटिस सर्व कर लिया है और कंपनी ने उसे स्वीकार कर लिया है, तो रोजगार संबंध विधिवत समाप्त माना जाता है। ऐसे में बाद में उसी अवधि को दोबारा मांगना सामान्य परिस्थितियों में उचित नहीं माना जाता।

पूरा मामला कैसे शुरू हुआ

विवादित मामले में कर्मचारी ने अपने मैनेजर और HR को ईमेल के माध्यम से इस्तीफा भेजा। उसके अपॉइंटमेंट लेटर में 60 दिन का नोटिस पीरियड लिखा था। उसने नियमित रूप से काम जारी रखा, टीम को हैंडओवर दिया और कंपनी के अनुरोध पर कुछ अतिरिक्त समय भी कार्य किया ताकि प्रोजेक्ट अधूरा न रहे।

नोटिस पीरियड पूरा होने पर कंपनी ने उसे आधिकारिक रूप से रिलिविंग लेटर और एक्सपीरियंस लेटर जारी किया। फुल एंड फाइनल सेटलमेंट भी कर दिया गया। कर्मचारी ने नई नौकरी जॉइन कर ली और अपने करियर में आगे बढ़ गया।

करीब तीन से चार महीने बाद उसे कंपनी की नई HR टीम की ओर से संदेश मिला कि उसके नोटिस पीरियड की रिकॉर्डिंग में त्रुटि है और पूर्व HR द्वारा दी गई अनुमति “अमान्य” मानी जा रही है। कंपनी ने कहा कि या तो वह दोबारा नोटिस पीरियड सर्व करे या नोटिस अवधि की सैलरी का भुगतान करे।

यहीं से विवाद ने तूल पकड़ा। कर्मचारी के पास सभी ईमेल रिकॉर्ड, अंतिम कार्य दिवस की पुष्टि और रिलिविंग लेटर मौजूद थे। ऐसे में उसने इस मांग को अनुचित बताया।

क्या कंपनी दोबारा नोटिस पीरियड मांग सकती है

कानूनी दृष्टि से देखें तो रोजगार अनुबंध एक द्विपक्षीय समझौता है। यदि दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी शर्तें पूरी कर ली हैं और कंपनी ने कर्मचारी को आधिकारिक रूप से मुक्त कर दिया है, तो रोजगार संबंध समाप्त हो चुका माना जाता है।

रिलिविंग लेटर एक महत्वपूर्ण दस्तावेज होता है। यह प्रमाणित करता है कि कर्मचारी ने नोटिस पीरियड पूरा किया और कंपनी ने उसकी सेवाएं स्वीकार कर समाप्त कर दीं। फुल एंड फाइनल सेटलमेंट इस बात का संकेत है कि आर्थिक दायित्व भी समाप्त हो चुके हैं।

यदि कंपनी बाद में यह कहती है कि सिस्टम में गलती थी या HR बदल गया है, तो यह आंतरिक प्रशासनिक समस्या है। कर्मचारी पर दोबारा दायित्व डालना न्यायसंगत नहीं माना जाता। भारतीय संविदा कानून के सिद्धांतों के अनुसार, एक बार अनुबंध की शर्त पूरी हो जाने पर उसे पुनः लागू करना आसान नहीं होता, विशेषकर तब जब लिखित प्रमाण उपलब्ध हों।

Notice Period Controversy
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HR विभाग की भूमिका और जिम्मेदारी

HR विभाग कंपनी का आधिकारिक प्रतिनिधि होता है। यदि HR ने ईमेल या लिखित रूप में कर्मचारी को अंतिम कार्य दिवस की पुष्टि दी है, तो वह कंपनी की आधिकारिक स्थिति मानी जाती है। बाद में HR टीम बदल जाने से पहले की स्वीकृति स्वतः अमान्य नहीं हो जाती।

कई बार कंपनियों में आंतरिक समन्वय की कमी, रिकॉर्ड अपडेट में देरी या सिस्टम की तकनीकी समस्या के कारण ऐसी स्थितियां उत्पन्न होती हैं। लेकिन यह जिम्मेदारी कंपनी की होती है कि वह अपने प्रशासनिक रिकॉर्ड सही रखे। कर्मचारी ने यदि अपने दायित्व पूरे कर दिए हैं, तो उसे कंपनी की गलती का खामियाजा नहीं भुगतना चाहिए।

कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण सीख

यह घटना हर नौकरीपेशा व्यक्ति के लिए एक चेतावनी है कि नौकरी छोड़ते समय सभी प्रक्रियाएं लिखित रूप में पूरी करें। इस्तीफा हमेशा ईमेल के जरिए दें। अंतिम कार्य दिवस की लिखित पुष्टि लें। हैंडओवर डॉक्यूमेंट्स और ट्रांजिशन मेल सुरक्षित रखें। रिलिविंग लेटर और फुल एंड फाइनल सेटलमेंट की कॉपी संभालकर रखें।

कई लोग मौखिक आश्वासन पर भरोसा कर लेते हैं, लेकिन कॉरपोरेट दुनिया में लिखित प्रमाण ही अंतिम सत्य माना जाता है। यदि कोई विवाद उत्पन्न होता है, तो यही दस्तावेज आपकी सुरक्षा बनते हैं।

यदि दोबारा नोटिस की मांग हो तो क्या करें

यदि किसी कर्मचारी को इस प्रकार की मांग का सामना करना पड़े, तो उसे सबसे पहले लिखित स्पष्टीकरण मांगना चाहिए। कंपनी से यह पूछा जाना चाहिए कि किस अनुबंध या किस धारा के तहत दोबारा नोटिस की मांग की जा रही है।

इसके बाद अपने सभी दस्तावेज साझा करें और स्पष्ट रूप से बताएं कि नोटिस पीरियड पहले ही पूरा किया जा चुका है। यदि मामला गंभीर हो जाए, तो श्रम कानून विशेषज्ञ या वकील से सलाह लेना समझदारी भरा कदम हो सकता है। कई बार कानूनी परामर्श या औपचारिक नोटिस से ही विवाद सुलझ जाता है।

सोशल मीडिया पर क्यों बढ़ी चर्चा

इस मामले ने सोशल मीडिया पर व्यापक प्रतिक्रिया पैदा की क्योंकि बहुत से कर्मचारियों ने अपने अनुभव साझा किए। कुछ ने बताया कि कंपनियां कभी-कभी प्रशासनिक त्रुटियों का हवाला देकर कर्मचारियों पर अतिरिक्त दबाव डालती हैं। वहीं कुछ HR पेशेवरों ने कहा कि प्रक्रियाओं की स्पष्टता और सही दस्तावेजीकरण दोनों पक्षों के लिए जरूरी है।

यह घटना इस बात की ओर इशारा करती है कि आधुनिक कार्यस्थलों में पारदर्शिता और संचार कितना महत्वपूर्ण है। जब कर्मचारी और कंपनी दोनों अपने दायित्व स्पष्ट रूप से समझते हैं, तब ऐसे विवाद की संभावना कम हो जाती है।

बदलते कॉरपोरेट माहौल में भरोसे की अहमियत

आज के प्रतिस्पर्धी बाजार में कंपनियां टैलेंट को बनाए रखने के लिए प्रयास कर रही हैं। कर्मचारी अनुभव और संगठन की साख दोनों महत्वपूर्ण हैं। यदि किसी कर्मचारी के साथ इस तरह का विवाद होता है, तो यह न केवल उसके करियर पर असर डाल सकता है बल्कि कंपनी की प्रतिष्ठा पर भी प्रश्नचिह्न लगा सकता है।

भरोसा ही किसी भी पेशेवर संबंध की नींव है। जब कर्मचारी नोटिस पीरियड ईमानदारी से पूरा करता है, तो वह अपनी पेशेवर प्रतिबद्धता दिखाता है। उसी प्रकार कंपनी का कर्तव्य है कि वह स्पष्ट और निष्पक्ष व्यवहार करे।

जागरूकता ही सुरक्षा है

इस पूरे प्रकरण से सबसे बड़ी सीख यही मिलती है कि नौकरी छोड़ना केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि कानूनी और प्रशासनिक रूप से महत्वपूर्ण कदम है। हर कर्मचारी को अपने अनुबंध की शर्तों को समझना चाहिए और सभी प्रक्रियाओं का लिखित रिकॉर्ड रखना चाहिए।

यदि आपने नियमों का पालन किया है और कंपनी ने आपको आधिकारिक रूप से मुक्त कर दिया है, तो दोबारा नोटिस पीरियड की मांग सामान्य परिस्थितियों में उचित नहीं मानी जाती। ऐसे मामलों में घबराने के बजाय तथ्यों और दस्तावेजों के आधार पर अपनी बात रखना ही सबसे सही रास्ता है।

कॉरपोरेट दुनिया में नियम दोनों पक्षों पर समान रूप से लागू होते हैं। जागरूक कर्मचारी ही अपने अधिकारों की रक्षा कर सकता है। इसलिए हर कदम सोच-समझकर उठाएं, दस्तावेज सुरक्षित रखें और अपने पेशेवर भविष्य को किसी प्रशासनिक गलती की भेंट न चढ़ने दें।

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