भारत में डिजिटल क्रांति ने आम लोगों की जिंदगी को जितना आसान बनाया है, उतनी ही तेजी से इसने कुछ नई और खामोश समस्याओं को भी जन्म दिया है। इन्हीं समस्याओं में से एक है क्रेडिट कार्ड का बढ़ता इस्तेमाल और उससे जुड़ा कर्ज, जिसकी सबसे बड़ी मार आज की युवा पीढ़ी पर पड़ रही है। 20 से 35 वर्ष की उम्र के युवा आज सबसे ज्यादा क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल कर रहे हैं और दुर्भाग्य से यही वर्ग सबसे ज्यादा कर्ज के बोझ में भी दबता जा रहा है। पहली नौकरी, पहली सैलरी और आर्थिक आज़ादी का सपना युवाओं को जिस रास्ते पर ले जाता है, वही रास्ता कई बार उन्हें वित्तीय संकट की ओर भी धकेल देता है।
क्रेडिट कार्ड शुरुआत में एक सुविधा की तरह लगता है। यह ऐसा साधन दिखाई देता है, जो जरूरत के वक्त तुरंत मदद करता है और जेब में नकदी न होने की परेशानी से बचाता है। लेकिन धीरे-धीरे यही सुविधा आदत बन जाती है और आदत कब लत में बदल जाती है, इसका एहसास युवाओं को तब होता है जब हर महीने आने वाला बिल उनकी आय से बड़ा नजर आने लगता है।
सुविधा से शुरू हुआ क्रेडिट कार्ड अब बनता जा रहा है लाइफस्टाइल का हिस्सा
पहले समय में क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल बहुत सीमित था और लोग इसे आपात स्थिति के लिए संभालकर रखते थे। आज हालात बिल्कुल बदल चुके हैं। ऑनलाइन शॉपिंग, फूड डिलीवरी ऐप्स, ओटीटी प्लेटफॉर्म, कैब सर्विस, होटल और फ्लाइट बुकिंग जैसी सुविधाओं ने क्रेडिट कार्ड को रोजमर्रा की जरूरत बना दिया है। युवाओं के लिए यह सिर्फ भुगतान का जरिया नहीं, बल्कि एक आरामदायक लाइफस्टाइल का हिस्सा बन चुका है।
अभी खरीदो और बाद में चुकाओ जैसी सोच युवाओं के मन में यह भ्रम पैदा करती है कि खर्च का बोझ फिलहाल नहीं है। कार्ड स्वाइप करते वक्त पैसा जाता हुआ दिखाई नहीं देता और यही अदृश्य खर्च सबसे बड़ा खतरा बन जाता है। जब तक बिल सामने आता है, तब तक खर्च की सीमा पार हो चुकी होती है।
युवा वर्ग ही क्यों बन रहा है सबसे आसान शिकार
आज की युवा पीढ़ी तकनीक के इस्तेमाल में बेहद तेज है, लेकिन वित्तीय समझ के मामले में अभी भी पीछे है। बहुत से युवा क्रेडिट कार्ड लेने से पहले उसकी शर्तों, ब्याज दरों और भुगतान नियमों को गंभीरता से नहीं पढ़ते। उन्हें लगता है कि हर महीने सैलरी आएगी और बिल किसी न किसी तरह चुक ही जाएगा।
यह सोच तब टूटती है जब अचानक नौकरी चली जाती है, इनकम घट जाती है या कोई मेडिकल इमरजेंसी सामने आ जाती है। ऐसे में क्रेडिट कार्ड का बकाया बोझ बनकर सामने खड़ा हो जाता है और इससे निकलना आसान नहीं होता।

आसान अप्रूवल ने बढ़ा दिया जोखिम
आज के समय में क्रेडिट कार्ड लेना पहले जितना मुश्किल नहीं रहा। बैंक और फाइनेंशियल कंपनियां युवाओं को आकर्षित करने के लिए इंस्टेंट अप्रूवल, कम दस्तावेज और प्री-अप्रूव्ड कार्ड जैसी सुविधाएं दे रही हैं। कई बार तो कॉलेज से निकलते ही या पहली नौकरी लगते ही युवाओं को क्रेडिट कार्ड का ऑफर मिलने लगता है।
कार्ड मिल जाना आसान है, लेकिन उसके साथ आने वाली जिम्मेदारी को समझना उतना ही जरूरी है। दुर्भाग्य से ज्यादातर युवा इस जिम्मेदारी को हल्के में ले लेते हैं और यहीं से परेशानी की शुरुआत होती है।
EMI की आसान किश्तें कैसे बना देती हैं बड़ा जाल
EMI सिस्टम को युवाओं के लिए सबसे सुरक्षित विकल्प के रूप में पेश किया जाता है। महंगे मोबाइल, लैपटॉप, इलेक्ट्रॉनिक्स और यहां तक कि कपड़े भी आसान किश्तों में उपलब्ध हैं। कम मासिक किस्त देखकर युवाओं को लगता है कि वे आराम से इसे चुका पाएंगे।
लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब एक नहीं, बल्कि कई EMI एक साथ चलने लगती हैं। हर EMI छोटी लगती है, लेकिन जब सभी को जोड़कर देखा जाए तो सैलरी का बड़ा हिस्सा सिर्फ किश्तों में ही चला जाता है। ऐसे में बचत की गुंजाइश खत्म हो जाती है और किसी भी अनचाही स्थिति में युवा पूरी तरह असहाय हो जाते हैं।
मिनिमम अमाउंट ड्यू का भ्रम सबसे खतरनाक
क्रेडिट कार्ड बिल में लिखा मिनिमम अमाउंट ड्यू युवाओं को सबसे ज्यादा गुमराह करता है। उन्हें लगता है कि इतना भर देने से वे सुरक्षित हैं और बैंक उनसे खुश रहेगा। हकीकत यह है कि मिनिमम अमाउंट भरना समस्या का समाधान नहीं, बल्कि उसे लंबा करने का तरीका है।
मिनिमम भुगतान करने पर पूरा ब्याज बकाया रकम पर लगता रहता है और कर्ज महीनों甚至 सालों तक बना रहता है। युवा यह सोचते हैं कि वे जिम्मेदारी निभा रहे हैं, जबकि वास्तव में वे अपने भविष्य को और मुश्किल बना रहे होते हैं।
फाइनेंशियल शिक्षा की कमी एक बड़ी वजह
भारत में आज भी स्कूल और कॉलेज स्तर पर वित्तीय शिक्षा को गंभीरता से नहीं लिया जाता। युवाओं को यह नहीं सिखाया जाता कि क्रेडिट स्कोर क्या होता है, ब्याज दर कैसे काम करती है और कर्ज का सही तरीके से प्रबंधन कैसे किया जाए। नतीजा यह होता है कि जब युवा पहली बार क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल करते हैं, तो वे वही गलतियां करते हैं जिनका खामियाजा उन्हें सालों तक भुगतना पड़ता है।
अगर सही समय पर सही जानकारी मिल जाए, तो बहुत सी समस्याओं से बचा जा सकता है। लेकिन जानकारी के अभाव में युवा अनुभव के भरोसे फैसले लेते हैं, जो अक्सर गलत साबित होते हैं।
सोशल मीडिया और दिखावे की दौड़ ने बढ़ाया खर्च
सोशल मीडिया ने युवाओं के बीच एक नई प्रतिस्पर्धा पैदा कर दी है। हर कोई खुद को बेहतर दिखाना चाहता है। महंगे गैजेट्स, ब्रांडेड कपड़े, फाइव स्टार होटल और ट्रैवल तस्वीरें युवाओं पर अनजाने में दबाव बनाती हैं। इस दबाव में वे अपनी आय से ज्यादा खर्च कर बैठते हैं।
क्रेडिट कार्ड इस खर्च को आसान बना देता है, क्योंकि तुरंत जेब खाली होने का अहसास नहीं होता। लेकिन बाद में यही दिखावा भारी पड़ता है।
बढ़ता क्रेडिट कार्ड कर्ज एक गंभीर चेतावनी
पिछले कुछ वर्षों में क्रेडिट कार्ड से जुड़ा कर्ज तेजी से बढ़ा है। इसमें सबसे बड़ी हिस्सेदारी युवा वर्ग की है। जिन युवाओं की नौकरी स्थिर नहीं है या जिनकी इनकम अनियमित है, उनके लिए यह कर्ज और भी खतरनाक साबित हो रहा है।
फ्रीलांस और गिग इकॉनमी में काम करने वाले युवा इस जोखिम के सबसे करीब हैं, क्योंकि उनकी आमदनी हर महीने समान नहीं होती।
मानसिक तनाव और रिश्तों पर असर
क्रेडिट कार्ड का बोझ सिर्फ आर्थिक नहीं होता, बल्कि मानसिक भी होता है। लगातार आने वाली रिकवरी कॉल्स, बढ़ता ब्याज और हर महीने का दबाव युवाओं को मानसिक तनाव में डाल देता है। कई बार यह तनाव नींद की कमी, चिड़चिड़ेपन और अवसाद की वजह भी बन जाता है।
पैसों की समस्या का असर पारिवारिक और व्यक्तिगत रिश्तों पर भी पड़ता है। बात-बात पर तनाव और बहस होने लगती है, जिससे जीवन की गुणवत्ता प्रभावित होती है।
खराब क्रेडिट स्कोर भविष्य की राह मुश्किल बना देता है
क्रेडिट कार्ड का गलत इस्तेमाल युवाओं के क्रेडिट स्कोर को बुरी तरह प्रभावित करता है। खराब स्कोर का मतलब है कि भविष्य में घर, गाड़ी या बिजनेस के लिए लोन मिलना मुश्किल हो सकता है। अगर लोन मिलता भी है, तो ब्याज दर ज्यादा होती है।
आज की छोटी लापरवाही आने वाले कई वर्षों तक युवाओं का पीछा करती है।
समझदारी से इस्तेमाल किया जाए तो क्रेडिट कार्ड फायदेमंद भी है
यह कहना गलत होगा कि क्रेडिट कार्ड पूरी तरह खराब है। सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए तो यह कई फायदे भी देता है। यह आपात स्थिति में मदद करता है, कैशलेस लेनदेन को आसान बनाता है और सही भुगतान करने पर क्रेडिट स्कोर को बेहतर भी बनाता है।
समस्या तब पैदा होती है जब खर्च पर नियंत्रण नहीं रहता और कार्ड को मुफ्त के पैसे की तरह इस्तेमाल किया जाने लगता है।
अंतिम विचार: आज की समझदारी कल की सुरक्षा
क्रेडिट कार्ड आज की युवा पीढ़ी के लिए एक दोधारी तलवार की तरह है। सही हाथों में यह सुविधा है, गलत इस्तेमाल में यही सबसे बड़ा संकट बन सकता है। युवाओं को यह समझना होगा कि क्रेडिट कार्ड से किया गया हर खर्च आखिरकार उनकी जेब से ही जाना है।
अगर आज युवा सही फैसले लेते हैं, खर्च पर नियंत्रण रखते हैं और वित्तीय समझ विकसित करते हैं, तो वे न सिर्फ कर्ज के जाल से बच सकते हैं, बल्कि एक सुरक्षित और मजबूत भविष्य भी बना सकते हैं।






