उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य के गरीब और वंचित बच्चों के लिए एक ऐसा बड़ा कदम उठाया है, जिसकी चर्चा पूरे राज्य में हो रही है। बाल शिक्षा के अधिकार कानून यानी RTE के तहत प्राइवेट स्कूलों में मिलने वाले नि:शुल्क प्रवेश को लेकर सरकार ने एक महत्वपूर्ण बदलाव किया है। अब बच्चों के प्रवेश के लिए आधार कार्ड अनिवार्य नहीं रहेगा। नया नियम यह कहता है कि केवल माता या पिता का आधार नंबर देना पर्याप्त होगा। इस कदम के बाद हजारों परिवारों के सिर से कागजी दस्तावेजों का बोझ कम हो गया है और उन बच्चों के लिए भी रास्ता खुल गया है जिनका आधार कार्ड अब तक नहीं बन पाया था।
RTE यानी राइट टू एजुकेशन एक्ट 2009 में लागू हुआ था और इसके तहत छह से चौदह वर्ष के हर बच्चे को निःशुल्क शिक्षा पाने का कानूनी अधिकार मिला। इस कानून के तहत निजी स्कूलों को अपनी कुल सीटों में से पच्चीस प्रतिशत सीटें आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों के लिए आरक्षित रखनी होती हैं। इन आरक्षित सीटों पर प्री-नर्सरी से लेकर पहली कक्षा तक प्रवेश दिया जाता है। आवेदन प्रक्रिया ऑनलाइन होती है और बच्चों का चयन लॉटरी सिस्टम के आधार पर किया जाता है ताकि पूरा प्रोसेस निष्पक्ष और पारदर्शी रहे। कागजों में यह व्यवस्था बहुत सुव्यवस्थित है, लेकिन वास्तविकता में गरीब परिवारों के सामने दस्तावेजों की कमी सबसे बड़ी बाधा बन जाती थी।

अब तक आवेदन के लिए बच्चे के आधार और माता-पिता के आधार दोनों अनिवार्य थे। सबसे बड़ी चुनौती वही थी कि गरीब और ग्रामीण परिवारों के बच्चों का आधार कार्ड बनवाना आसान नहीं था। छोटे बच्चों का आधार बनना समय लेता है, आधार केंद्र दूर होते हैं, दस्तावेज तैयार करना मुश्किल होता है। इस वजह से हर साल हजारों पात्र परिवार आवेदन तक नहीं पहुंच पाते थे। अब सरकार के इस फैसले ने पूरी तस्वीर बदलनी शुरू कर दी है। बच्चे के आधार की जरूरत हटने के बाद बहुत से परिवार पहली बार RTE के तहत आवेदन कर पाएंगे। शिक्षा विभाग का मानना है कि इस परिवर्तन से प्रवेश लेने वाले बच्चों की संख्या में बड़ा इजाफा होगा।
सरकार का स्पष्ट उद्देश्य यह है कि शिक्षा व्यवस्था से कोई बच्चा बाहर न रहे। शिक्षा विभाग ने इस निर्णय को पूरी तरह व्यावहारिक बताया है, क्योंकि आवेदन प्रक्रिया में सबसे बड़ी बाधा दस्तावेज ही थे। सरकार का मानना है कि दस्तावेजों की व्यवस्था इतनी कठोर नहीं होनी चाहिए कि परिवार सिस्टम से बाहर रह जाए। अगर कोई माता या पिता आधार संख्या उपलब्ध करा देते हैं, तो बच्चे के अधिकारों को सीमित नहीं किया जाना चाहिए। यह सुधार वास्तविक जरूरतों को समझकर किया गया है, न कि केवल नीति को साफ-सुथरा दिखाने के लिए। यह वही दृष्टिकोण है जो समाज को वास्तव में मजबूत करता है।
नई RTE आवेदन प्रणाली अब अधिक सरल है। अभिभावक पोर्टल पर जाकर बच्चे का नाम, जन्म विवरण, माता या पिता का आधार नंबर और स्कूल की पसंद दर्ज कर सकते हैं। इसके बाद लॉटरी होती है, परिणाम जारी होते हैं और सही समय पर दस्तावेजों की जांच होती है। स्कूल और जिला अधिकारी चयनित बच्चों की पुष्टि करते हैं और प्रवेश की प्रक्रिया पूरी होती है। एक नियम यह जरूर रहेगा कि सरकार द्वारा स्कूलों को दी जाने वाली फीस प्रतिपूर्ति के लिए अभिभावक के नाम से आधार लिंक बैंक खाता आवश्यक होगा। लेकिन बच्चे के लिए आधार अब कोई बाधा नहीं है।
यह बदलाव सबसे ज्यादा उन परिवारों के लिए फायदेमंद है जो दिहाड़ी मजदूर, प्रवासी, ग्रामीण या अनौपचारिक क्षेत्रों में काम करते हैं। अक्सर ऐसे घरों में बच्चे का आधार न होने के कारण आवेदन तक नहीं किया जा पाता था, जबकि वे पूरी तरह पात्र होते थे। अब ऐसे परिवारों को पहली बार मौका मिलेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से स्कूलों में RTE सीटों का बेहतर उपयोग होगा, सीटें खाली नहीं रहेंगी और सरकारी शिक्षा योजनाओं का असली उद्देश्य जमीन पर पूरा होगा। जब गरीब घरों के बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ने लगेंगे, तो शिक्षा में असमानता धीरे-धीरे कम होगी।
RTE योजना पर सरकार पहले भी कई सुधार कर चुकी है और आगे भी इसे और बेहतर बनाने की दिशा में काम जारी रहेगा। संभव है आने वाले वर्षों में दस्तावेजों का सत्यापन डिजिटल माध्यम से और आसान बना दिया जाए ताकि अभिभावकों को सरकारी दफ्तरों के चक्कर भी न लगाने पड़ें। सरकार के अधिकारी कह रहे हैं कि शिक्षा के रास्ते पर कोई रुकावट नहीं रखी जाएगी क्योंकि गरीबी और दस्तावेजों की कमी बच्चे के सपनों को रोकने का कारण नहीं बन सकती।
उत्तर प्रदेश सरकार का यह फैसला केवल नीति संशोधन नहीं, बल्कि शिक्षा के अधिकार को वास्तव में सार्वभौमिक बनाने की दिशा में एक क्रांतिकारी शुरुआत है। अब RTE उन बच्चों तक भी पहुँचेगा जो कल तक इस अधिकार से वंचित रह जाते थे। संदेश साफ है—शिक्षा हर बच्चे की है, चाहे उसके पास आधार कार्ड हो या न हो। यह निर्णय आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को बदल सकता है और शिक्षा को वास्तव में सबके लिए समावेशी बना सकता है। यूपी की इस पहल को देश के बाकी राज्यों के लिए भी एक मिसाल माना जा रहा है, और उम्मीद यही है कि एक दिन भारत में कोई बच्चा केवल कागज़ न होने की वजह से स्कूल से बाहर नहीं रहेगा।







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