प्रयागराज में पौष पूर्णिमा के साथ ही माघ मेले का शुभारंभ होते ही त्रिवेणी संगम पर आस्था का अद्भुत दृश्य देखने को मिला। ठंड भरी सुबह, कोहरे में लिपटी गंगा-यमुना की धाराएं और दूर तक फैले श्रद्धालुओं के जनसैलाब ने यह साफ कर दिया कि माघ मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय आस्था और संस्कृति का जीवंत उत्सव है। पहली ही सुबह लगभग 9 लाख श्रद्धालुओं ने संगम के पावन जल में स्नान कर पुण्य लाभ प्राप्त किया।
सूर्योदय से पहले ही संगम तट पर हर-हर गंगे और जय मां यमुना के उद्घोष गूंजने लगे थे। देश के कोने-कोने से आए श्रद्धालु, कल्पवासी, साधु-संत और श्रद्धालु परिवार ठंड की परवाह किए बिना स्नान के लिए पहुंचे। मान्यता है कि पौष पूर्णिमा पर संगम स्नान से जन्म-जन्मांतर के पापों का क्षय होता है और मन को शांति व आत्मिक बल मिलता है। इसी विश्वास ने लाखों लोगों को एक सूत्र में बांध दिया।
माघ मेले का यह पहला स्नान पर्व अपने आप में खास होता है। यह वह दिन है जब कल्पवास की विधिवत शुरुआत होती है। कल्पवासी एक माह तक संगम तट पर रहकर संयम, साधना और सेवा का मार्ग अपनाते हैं। इस दौरान वे नियमित स्नान, दान, जप-तप और सत्संग के माध्यम से आत्मशुद्धि का प्रयास करते हैं। पहली सुबह संगम तट पर कल्पवासियों की टोलियां अपने-अपने शिविरों से निकलकर स्नान के लिए पहुंचीं, जिससे मेले की आध्यात्मिक छवि और भी सशक्त नजर आई।
साधु-संतों की उपस्थिति ने मेले के वातावरण को और अधिक पवित्र बना दिया। अखाड़ों से जुड़े नागा साधु, वैरागी और संत समाज के अन्य वर्गों ने भी संगम में स्नान किया। कई संतों ने इसे मानव जीवन में संयम और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देने वाला अवसर बताया। उनके अनुसार माघ मेला व्यक्ति को भौतिकता से ऊपर उठकर आध्यात्मिक मूल्यों से जोड़ता है।

इतनी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के आगमन को देखते हुए प्रशासन ने व्यापक इंतजाम किए थे। संगम क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी रही, पुलिस और स्वयंसेवकों की तैनाती की गई ताकि स्नान सुचारु रूप से संपन्न हो सके। घाटों पर बैरिकेडिंग, सीसीटीवी निगरानी, चिकित्सा शिविर, पेयजल, अस्थायी शौचालय और स्वच्छता पर विशेष ध्यान दिया गया। ठंड को देखते हुए जगह-जगह अलाव की व्यवस्था भी की गई, जिससे श्रद्धालुओं को राहत मिली।
माघ मेले का सामाजिक और सांस्कृतिक पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यहां केवल स्नान ही नहीं, बल्कि धार्मिक प्रवचन, कथा-कीर्तन, योग-ध्यान और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित होते हैं। पहली सुबह कई पंडालों में संतों के प्रवचन शुरू हो गए, जिनमें जीवन के नैतिक मूल्यों, करुणा और सेवा भाव पर जोर दिया गया। यह मेला पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं को जीवित रखने का माध्यम भी है।
आर्थिक दृष्टि से भी माघ मेला प्रयागराज के लिए महत्वपूर्ण होता है। मेले के दौरान स्थानीय व्यापार, हस्तशिल्प, पूजा-सामग्री, खान-पान और परिवहन से जुड़े लोगों को रोजगार मिलता है। पहली सुबह ही दुकानों और अस्थायी बाजारों में रौनक दिखी, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि आने वाले दिनों में मेला शहर की आर्थिक गतिविधियों को भी गति देगा।
कुल मिलाकर, माघ मेले की पहली सुबह ने यह संदेश दिया कि आधुनिकता के इस दौर में भी भारतीय समाज की जड़ें आस्था, परंपरा और सामूहिकता में गहराई से जुड़ी हुई हैं। त्रिवेणी संगम पर लगी यह पवित्र डुबकी केवल जल में प्रवेश नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि और विश्वास के नवीनीकरण का प्रतीक है। आने वाले स्नान पर्वों पर श्रद्धालुओं की संख्या और बढ़ने की संभावना है, जिससे माघ मेला एक बार फिर अपनी भव्यता और आध्यात्मिक गरिमा के साथ देश-दुनिया को आकर्षित करेगा।