भारत को आज दुनिया की डिजिटल पेमेंट राजधानी कहा जाता है। UPI ने कुछ ही वर्षों में आम लोगों की ज़िंदगी बदल दी। चाय की दुकान से लेकर मॉल तक, हर जगह QR कोड दिखाई देता है। मोबाइल से पेमेंट करना अब किसी लग्ज़री की तरह नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की आदत बन चुका है। इसके बावजूद एक चौंकाने वाली सच्चाई सामने आ रही है कि डिजिटल पेमेंट के इस सुनहरे दौर में भी नकद यानी कैश की पकड़ कमजोर नहीं हुई है। बल्कि कई संकेत बताते हैं कि डिजिटल भुगतान की रफ्तार अब उतनी तेज़ नहीं रही, जितनी शुरुआती वर्षों में थी।

भारतीय रिज़र्व बैंक और वित्तीय संस्थानों के आंकड़े बताते हैं कि UPI ट्रांजैक्शन लगातार बढ़ रहे हैं, लेकिन उसी अनुपात में सर्कुलेशन में मौजूद नकदी भी ऊँचे स्तर पर बनी हुई है। इसका सीधा अर्थ यह है कि लोग डिजिटल पेमेंट अपना तो रहे हैं, लेकिन कैश छोड़ने को तैयार नहीं हैं। डिजिटल सिस्टम भारत में एक अतिरिक्त विकल्प बन चुका है, उसका विकल्प नहीं।
इसकी सबसे बड़ी वजह भारत की सामाजिक और आर्थिक संरचना है। देश की बड़ी आबादी आज भी ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में रहती है, जहाँ इंटरनेट कनेक्टिविटी हर समय भरोसेमंद नहीं होती। स्मार्टफोन की पहुंच बढ़ी है, लेकिन डिजिटल साक्षरता अब भी सीमित है। ऐसे में नकद लेन-देन सरल, तेज़ और बिना किसी तकनीकी झंझट के होता है। गाँवों और छोटे कस्बों में कैश सिर्फ भुगतान का साधन नहीं, बल्कि भरोसे का प्रतीक है।
शहरों में भी तस्वीर पूरी तरह अलग नहीं है। छोटे दुकानदार और ठेले-रेहड़ी वाले डिजिटल भुगतान स्वीकार तो करते हैं, लेकिन कैश को प्राथमिकता देना नहीं छोड़ते। इसके पीछे टैक्स और निगरानी का डर बड़ा कारण है। डिजिटल ट्रांजैक्शन रिकॉर्ड में आता है, जिससे आय और खर्च का पूरा ब्योरा सिस्टम में दर्ज हो जाता है। बहुत से छोटे व्यापारियों को लगता है कि इससे उन्हें टैक्स या जांच का सामना करना पड़ सकता है। यही वजह है कि डिजिटल भुगतान सुविधा होने के बावजूद वे नकद को ज्यादा सुरक्षित मानते हैं।
डिजिटल भुगतान की रफ्तार पर असर डालने वाला एक और बड़ा कारण साइबर फ्रॉड है। हाल के वर्षों में UPI फ्रॉड, फर्जी कॉल, फिशिंग लिंक और स्कैम मैसेज की घटनाएँ तेजी से बढ़ी हैं। आम लोग अब डिजिटल पेमेंट को लेकर पहले जितने निश्चिंत नहीं रहे। कई लोग मोबाइल से छोटे-मोटे भुगतान तो कर लेते हैं, लेकिन बड़ी रकम के लिए आज भी कैश पर भरोसा करते हैं। यह डर डिजिटल इकोसिस्टम के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।
इसके अलावा, डिजिटल भुगतान प्रणाली के बिज़नेस मॉडल पर भी दबाव बढ़ रहा है। UPI पर ज़ीरो MDR नीति ग्राहकों और व्यापारियों के लिए फायदेमंद है, लेकिन इससे बैंकों और पेमेंट कंपनियों की कमाई सीमित हो जाती है। लंबे समय में यह मॉडल नई तकनीक, सुरक्षा और सर्विस में निवेश को प्रभावित कर सकता है। जब सिस्टम के अंदर निवेश की गति धीमी होती है, तो उसका असर पूरे डिजिटल इकोसिस्टम पर दिखाई देता है।
कैश की मजबूती का एक बड़ा कारण मनोवैज्ञानिक भी है। नकद पैसे में लोगों को खर्च पर नियंत्रण महसूस होता है। जेब से पैसा निकलते देख खर्च का एहसास होता है, जबकि डिजिटल भुगतान में एक क्लिक में पैसा चला जाता है। यही वजह है कि बहुत से लोग मानते हैं कि कैश उन्हें बेहतर फाइनेंशियल डिसिप्लिन देता है। इसके साथ ही प्राइवेसी का पहलू भी जुड़ा है। नकद लेन-देन ट्रैक नहीं होता, जबकि डिजिटल पेमेंट हर कदम पर रिकॉर्ड बनाता है, जो सभी को सहज नहीं लगता।
सच्चाई यह है कि भारत में डिजिटल भुगतान की शुरुआती ग्रोथ इसलिए तेज़ थी क्योंकि शहरी, टेक-फ्रेंडली और बैंकिंग सिस्टम से जुड़े लोग जल्दी जुड़ गए। अब अगला चरण ज्यादा कठिन है, जहाँ ग्रामीण भारत, छोटे व्यापारी और कम-आय वर्ग को डिजिटल सिस्टम में भरोसे के साथ शामिल करना होगा। यही वह मोड़ है जहाँ डिजिटल भुगतान की रफ्तार थोड़ी धीमी महसूस हो रही है।
भविष्य की तस्वीर साफ है। भारत में कैश और डिजिटल भुगतान एक-दूसरे के खिलाफ नहीं, बल्कि साथ-साथ चलेंगे। सरकार और RBI डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत कर रहे हैं, साइबर सुरक्षा पर ध्यान बढ़ रहा है और डिजिटल साक्षरता को लेकर योजनाएँ चलाई जा रही हैं। लेकिन जब तक लोगों का भरोसा पूरी तरह नहीं बनता, तब तक नकद का विकल्प खत्म होना मुश्किल है।
डिजिटल इंडिया की कहानी सफलता की है, लेकिन यह अधूरी है। कैश का मजबूत रहना इस बात का संकेत है कि भारत की अर्थव्यवस्था सिर्फ तकनीक से नहीं, बल्कि ज़मीनी हकीकत, आदतों और भरोसे से चलती है। यही वजह है कि आज भी, तमाम डिजिटल क्रांति के बावजूद, यह कहना गलत नहीं होगा कि भारत में कैश अब भी किंग है।