भारत के टेलीकॉम सेक्टर में एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू यानी AGR का मुद्दा एक बार फिर सुर्खियों में है। सरकार ने हाल ही में संकट से जूझ रही वोडाफोन आइडिया को बड़ी राहत देने के संकेत दिए, ताकि कंपनी का अस्तित्व बचा रहे और बाजार में प्रतिस्पर्धा बनी रहे। लेकिन इसी राहत ने सरकार को एक नई मुश्किल में डाल दिया है। अब टाटा ग्रुप और भारती एयरटेल ने भी AGR बकाया को लेकर समान राहत की मांग रख दी है। इससे सरकार पर करीब 67 हजार करोड़ रुपये की संभावित देनदारी का दबाव बनता दिख रहा है।
AGR क्या है और विवाद की जड़ कहां है
AGR वह राजस्व होता है, जिसके आधार पर टेलीकॉम कंपनियां सरकार को लाइसेंस फीस और स्पेक्ट्रम यूसेज चार्ज देती हैं। कंपनियों का तर्क लंबे समय से रहा है कि AGR की गणना सिर्फ टेलीकॉम सेवाओं से होने वाली कमाई पर होनी चाहिए। वहीं सरकार का पक्ष यह रहा कि इसमें अन्य आय, जैसे ब्याज, डिविडेंड और किराए से होने वाली आमदनी भी शामिल हो। इसी व्याख्या के अंतर ने वर्षों तक चले कानूनी विवाद को जन्म दिया, जो आखिरकार सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला और कंपनियों पर बोझ
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के पक्ष में फैसला देते हुए कंपनियों को बकाया चुकाने का आदेश दिया। इसके बाद से ही टेलीकॉम कंपनियों पर हजारों करोड़ रुपये का बोझ आ गया। खासकर वोडाफोन आइडिया के लिए यह बोझ जानलेवा साबित हुआ। कंपनी पहले ही भारी कर्ज में डूबी थी और AGR बकाया ने उसकी वित्तीय हालत और बिगाड़ दी।
वोडाफोन आइडिया को मिली राहत
सरकार ने हाल के वर्षों में वोडाफोन आइडिया को कई तरह की राहत दी। इसमें भुगतान की समय-सीमा बढ़ाना, ब्याज पर छूट और बकाया को इक्विटी में बदलने जैसे कदम शामिल हैं। इन फैसलों का मकसद यह था कि देश में सिर्फ एक-दो निजी टेलीकॉम कंपनियां न बचें और उपभोक्ताओं के पास विकल्प बने रहें। लेकिन यहीं से सरकार की मुश्किलें भी शुरू हो गईं।
एयरटेल और टाटा की मांग क्यों अहम है
भारती एयरटेल और टाटा समूह का कहना है कि अगर एक कंपनी को AGR में राहत दी जा सकती है, तो समान परिस्थितियों में बाकी कंपनियों को भी बराबरी का लाभ मिलना चाहिए। एयरटेल पहले ही AGR का बड़ा हिस्सा चुका चुकी है, लेकिन उसका तर्क है कि नियमों में ढील या ब्याज माफी सभी के लिए होनी चाहिए। वहीं टाटा टेलीसर्विसेज, जो अब मुख्य रूप से एंटरप्राइज और ब्रॉडबैंड सेवाओं में सक्रिय है, ने भी अपने पुराने बकायों को लेकर राहत की मांग रखी है।
67 हजार करोड़ की देनदारी का खतरा
विशेषज्ञों के मुताबिक अगर सरकार एयरटेल और टाटा की मांगें मान लेती है, तो सरकारी खजाने पर करीब 67 हजार करोड़ रुपये तक का अतिरिक्त भार पड़ सकता है। यह राशि सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि देश के राजकोषीय संतुलन और बजट योजनाओं पर असर डाल सकती है। सरकार पहले ही सब्सिडी, इंफ्रास्ट्रक्चर और सामाजिक योजनाओं पर बड़ा खर्च कर रही है।
सरकार के सामने दोहरी चुनौती
सरकार के सामने इस वक्त दोहरी चुनौती है। एक तरफ उसे टेलीकॉम सेक्टर को स्थिर और प्रतिस्पर्धी बनाए रखना है, क्योंकि यही सेक्टर डिजिटल इंडिया की रीढ़ है। दूसरी तरफ उसे यह भी सुनिश्चित करना है कि सरकारी राजस्व पर अनावश्यक दबाव न पड़े और किसी एक कंपनी को राहत देने से बाकी कंपनियां नाराज न हों।
बाजार और निवेशकों की नजर
इस पूरे मामले पर शेयर बाजार और निवेशकों की नजर भी टिकी हुई है। वोडाफोन आइडिया के शेयरों में राहत की खबरों के बाद हलचल देखी गई, जबकि एयरटेल जैसी मजबूत कंपनी के लिए यह मामला सिद्धांत और समानता का बन गया है। निवेशक चाहते हैं कि नीति स्पष्ट हो, ताकि भविष्य में ऐसे विवाद दोबारा न खड़े हों।
उपभोक्ताओं पर क्या पड़ेगा असर
अगर AGR विवाद का समाधान संतुलित तरीके से नहीं हुआ, तो इसका असर आखिरकार उपभोक्ताओं पर भी पड़ सकता है। कंपनियां अपने बढ़ते खर्च की भरपाई के लिए टैरिफ बढ़ा सकती हैं। इससे मोबाइल और डेटा सेवाएं महंगी हो सकती हैं, जो आम लोगों की जेब पर सीधा असर डालेगा।
आगे का रास्ता क्या हो सकता है
विशेषज्ञ मानते हैं कि सरकार को एक स्पष्ट और समान नीति बनानी होगी। या तो AGR नियमों में सभी के लिए समान राहत दी जाए, या फिर भविष्य के लिए गणना के तरीके को सरल और पारदर्शी बनाया जाए। इससे न सिर्फ कंपनियों का भरोसा बढ़ेगा, बल्कि लंबे समय तक चलने वाले कानूनी विवादों से भी बचा जा सकेगा।
निष्कर्ष
वोडाफोन आइडिया को राहत देकर सरकार ने भले ही एक संकट टाल दिया हो, लेकिन उसी फैसले ने नए सवाल खड़े कर दिए हैं। टाटा और एयरटेल की मांगों ने AGR विवाद को फिर से केंद्र में ला दिया है। अब देखना यह होगा कि सरकार किस तरह संतुलन बनाती है, ताकि न तो टेलीकॉम सेक्टर कमजोर पड़े और न ही सरकारी खजाने पर 67 हजार करोड़ रुपये जैसी भारी देनदारी का बोझ आए। यह फैसला आने वाले वर्षों में भारत के डिजिटल भविष्य की दिशा तय कर सकता है।






