Taza Junction News

90-Day Notice Period पर बड़ा खुलासा: Big Four फर्म के मैनेजर ने क्यों कहा भारतीय कंपनियों की नीति ‘टॉक्सिक’?

90-Day Notice Period पर बड़ा खुलासा

90-Day Notice Period पर बड़ा खुलासा

भारत में नौकरी बदलने की प्रक्रिया अक्सर जितनी कठिन मानी जाती है, उसका एक बड़ा कारण है 90-दिन का नोटिस पीरियड। अब इस व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं एक Big Four अकाउंटिंग फर्म में काम करने वाले मैनेजर ने, जिन्होंने इसे न सिर्फ “पेनफुल” बल्कि “टॉक्सिक” सिस्टम करार दिया है। उनका कहना है कि यह नीति कर्मचारियों और कंपनियों—दोनों के लिए नुकसानदेह साबित हो रही है।

भारत में 90-दिन का नोटिस पीरियड क्यों बना विवाद का विषय?

भारत की कई बड़ी IT, कंसल्टिंग और कॉरपोरेट कंपनियों में इस्तीफा देने पर तीन महीने तक काम करना अनिवार्य होता है। कागज़ों में यह व्यवस्था सुचारू ट्रांजिशन और नॉलेज ट्रांसफर के लिए बनाई गई थी, लेकिन जमीनी हकीकत इससे काफी अलग दिखाई देती है।

Big Four फर्म के इस मैनेजर के मुताबिक, जैसे ही कोई कर्मचारी इस्तीफा देता है, वह मानसिक रूप से कंपनी से अलग हो चुका होता है। ऐसे में 90 दिन तक उसे जबरन रोकना न तो उत्पादक होता है और न ही व्यावहारिक।

मैनेजर ने क्या कहा? जानिए पूरी बात

मैनेजर ने सोशल प्लेटफॉर्म पर साझा किए अपने विचारों में कहा कि लंबा नोटिस पीरियड कर्मचारियों को “dead weight” में बदल देता है। उनका तर्क है कि—

कर्मचारी इस दौरान नई नौकरी की तैयारी में लगे रहते हैं,
काम में रुचि और इनोवेशन खत्म हो जाता है,
टीम का माहौल नकारात्मक हो जाता है,
और मैनेजरों पर भी अनावश्यक दबाव बढ़ जाता है।

उनका मानना है कि यह सिस्टम सिर्फ दिखावटी सुरक्षा देता है, जबकि असल में कंपनियों को इससे कोई ठोस लाभ नहीं मिलता।

ग्लोबल कंपनियों से तुलना: भारत क्यों है पीछे?

मैनेजर ने भारतीय सिस्टम की तुलना अमेरिका और चीन जैसे देशों से की।
अमेरिका में आमतौर पर 2 हफ्ते का नोटिस,
जबकि चीन में लगभग 30 दिन का नोटिस पीरियड होता है।

इन देशों में कर्मचारी ज़्यादा इंतज़ार किए बिना  नई नौकरी जॉइन कर लेते हैं और कंपनियों को भी सही समय पर कुशल कर्मचारी आसानी से मिल जाते हैं। वहीं भारत में 90 दिन का नोटिस पीरियड नौकरी बदलने की प्रक्रिया को धीमा और बेवजह जटिल बना देता है।”

भर्ती प्रक्रिया पर पड़ता है सीधा असर

लंबा नोटिस पीरियड केवल इस्तीफा देने वाले कर्मचारी की समस्या नहीं है। इसका असर नई भर्तियों पर भी साफ दिखाई देता है।

कई बार कंपनियां किसी कैंडिडेट को चुन तो लेती हैं, लेकिन 90 दिन इंतजार करने के दौरान वह किसी दूसरी बेहतर ऑफर को स्वीकार कर लेता है। इससे कंपनियों का समय, पैसा और संसाधन तीनों बर्बाद होते हैं।

सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस

इस बयान के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर तीखी बहस शुरू हो गई।कुछ प्रोफेशनल्स ने इसे भारतीय कॉरपोरेट कल्चर की सच्चाई बताया,तो कुछ लोगों का मानना है कि यह व्यवस्था कंपनियों को अचानक होने वाले टैलेंट लॉस से बचाने के लिए जरूरी है।

हालांकि, ज़्यादातर प्रतिक्रियाएं इस बात पर सहमत दिखीं कि 90 दिन का नोटिस पीरियड मौजूदा दौर के तेज़-रफ्तार जॉब मार्केट के अनुरूप नहीं है।

क्या वाकई कंपनियों को मिलता है कोई फायदा?

कंपनियां मानती हैं कि लंबा नोटिस पीरियड नॉलेज ट्रांसफर और काम सौंपने के लिए जरूरी है। लेकिन जो कर्मचारी मन से पहले ही नौकरी छोड़ चुका हो, क्या वह यह काम सही तरीके से कर पाता है?

विशेषज्ञों का मानना है कि क्वालिटी हैंडओवर समय से नहीं, बल्कि प्रोसेस और मोटिवेशन से होता है।

समाधान क्या हो सकता है?

इस बात से साफ है कि कंपनियों को अपने नियमों पर दोबारा सोचना चाहिए। अगर नोटिस पीरियड थोड़ा आसान हो और नौकरी छोड़ने के रास्ते सरल हों, तो यह परेशानी कम हो सकती है।

बदलते समय के साथ बदलनी होंगी नीतियां

Big Four फर्म के मैनेजर की यह टिप्पणी सिर्फ एक व्यक्ति की राय नहीं, बल्कि भारतीय कॉरपोरेट सिस्टम की एक बड़ी अभाव की ओर इशारा करती है। आज जब टैलेंट ही सबसे बड़ी ताकत है, तब उसे रोकने की बजाय सही तरीके से मैनेज करना ज्यादा जरूरी हो गया है।

90 दिन का नोटिस पीरियड शायद कभी उपयोगी रहा हो, लेकिन बदलते समय में अब यह नीति कई लोगों के लिए पेनफुल और टॉक्सिक साबित हो रही है।

Exit mobile version